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प्रत्यक्ष कर वह कर है जो किसी व्यक्ति या कंपनी की आय या लाभ पर सीधे लगाया जाता है, जबकि अप्रत्यक्ष कर वस्तुओं और सेवाओं की खरीद या उपभोग पर लगाया जाता है, जिसका अंतिम भार उपभोक्ता वहन करता है।
कर मूल रूप से वह राशि है जो व्यक्ति या व्यवसाय सरकार को देते हैं। इसी धन से सरकार देश का संचालन करती है और सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध कराती है। प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर के बीच अंतर समझने से पहले, इन दोनों की मूल परिभाषाएँ समझना ज़रूरी है।
प्रत्यक्ष कर वह कर है जो कोई व्यक्ति या संस्था सीधे सरकार को अदा करती है। यह व्यक्ति, फर्म, कंपनी या अन्य संगठन हो सकता है। चूंकि यह कर सीधे लगाया जाता है, इसलिए इसका भार किसी दूसरे व्यक्ति पर नहीं डाला जा सकता। प्रत्यक्ष कर आमतौर पर आपकी आय, लाभ या संपत्ति पर आधारित होता है। इसलिए, जितनी अधिक आय होगी, उतना अधिक कर देना पड़ सकता है।
अगर आप सोच रहे हैं कि प्रत्यक्ष कर क्या है, तो इसका सबसे सामान्य उदाहरण आयकर है। हर वर्ष व्यक्ति अपनी आय घोषित करता है और अपनी आय-श्रेणी के अनुसार कर का भुगतान करता है।
दूसरी ओर, अप्रत्यक्ष कर वह कर है जो सरकार वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर लगाती है, लेकिन सरकार तक पहुंचने से पहले इसे कोई मध्यस्थ वसूलता है। जब आप कोई वस्तु या सेवा खरीदते हैं, तो दुकानदार, विक्रेता या सेवा प्रदाता आपसे यह कर लेकर सरकार को जमा करता है। इस प्रकार, कर का भुगतान अंततः उपभोक्ता करता है, भले ही उसे जमा करने की जिम्मेदारी किसी और की हो।
अप्रत्यक्ष कर का सबसे आम उदाहरण वस्तु एवं सेवा कर (गुड्स एंड सर्विस टैक्स) यानी GST है। जब आप किराना, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़े या अन्य कोई वस्तु खरीदते हैं, तो आप GST चुकाते हैं। यह कर आप सीधे सरकार को नहीं देते, बल्कि यह वस्तु या सेवा की कीमत में शामिल होता है।
भारत में व्यक्तियों और व्यवसायों दोनों पर कई प्रकार के प्रत्यक्ष कर लगाए जाते हैं। आइए इन पर एक नज़र डालते हैं:
आयकर सबसे सामान्य प्रत्यक्ष करों में से एक है, जिसे वेतन भोगी और स्वरोजगार से जुड़े अधिकांश लोग चुकाते हैं। यह कर व्यक्ति की आय के अनुसार बदलता है, क्योंकि हर व्यक्ति अपनी आय-श्रेणी के आधार पर कर देता है। यह सीधे आय पर लगाया जाता है। इसी कारण आयकर की गणना में स्लैब रेट्स, डिडक्शन्स, एक्सेम्प्शंस, और अलग-अलग इनकम हेड्स की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
संपत्ति कर कुछ विशेष परिसंपत्तियों के बाजार मूल्य के आधार पर संबंधित वित्तीय वर्ष में लगाया जाता था। यह उन व्यक्तियों पर लागू होता था जिनकी कुल शुद्ध संपत्ति एक निश्चित सीमा से अधिक थी। हालांकि, भारत में इसे वर्ष 2015 में समाप्त कर दिया गया। फिर भी यह जानना महत्वपूर्ण है कि संपत्ति कर प्रत्यक्ष कर का एक प्रकार था।
कॉर्पोरेट कर भारत में कंपनियों और व्यवसायों के लाभ पर लगाया जाता है। सरकार देश चलाने और विकास कार्यों के लिए राजस्व जुटाने हेतु इस कर का उपयोग करती है। यह उन विदेशी कंपनियों पर भी लागू हो सकता है जिनकी आय भारत से उत्पन्न होती है।
कैपिटल गेन्स टैक्स निवेश की बिक्री से अर्जित आय पर लगाया जाता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि संपत्ति या निवेश को कितने समय तक रखा गया था। पूंजीगत लाभ दो प्रकार के होते हैं: दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ यानी LTCG और अल्पकालिक पूंजीगत लाभ यानी STCG। इन दोनों पर कर की दरें अलग-अलग हो सकती हैं।
प्रत्यक्ष कर कई महत्वपूर्ण लाभ प्रदान करते हैं। ये महंगाई को नियंत्रित करने, आय के संतुलित वितरण को बढ़ावा देने और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए संसाधन उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। आइए समझते हैं कि वित्तीय व्यवस्था में इनकी भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है।
प्रत्यक्ष कर वस्तुओं और सेवाओं की मांग को प्रभावित कर सकते हैं और इस तरह महंगाई को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। जब महंगाई बढ़ती है, तो सरकार प्रत्यक्ष करों की दरों में बदलाव कर सकती है। कर का भार बढ़ने पर लोगों की खर्च करने की क्षमता घट सकती है, जिससे मांग कम होती है और महंगाई पर नियंत्रण पाने में मदद मिलती है।
प्रत्यक्ष कर आमतौर पर भुगतान क्षमता के सिद्धांत पर आधारित होते हैं। यानी, जिसकी आय अधिक होती है, वह अधिक कर देता है। एक प्रगतिशील कर व्यवस्था में अधिक आय वाले व्यक्तियों पर अधिक दर से कर लगाया जा सकता है। इससे कर प्रणाली अपेक्षाकृत अधिक संतुलित और न्यायसंगत बनती है।
उच्च आय वर्ग से वसूले गए कर का उपयोग सरकार गरीब और वंचित वर्गों के लिए सुविधाएं, योजनाएं और कल्याणकारी कार्यक्रम चलाने में करती है। इससे आय असमानता कम करने और कम आय वर्ग के लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।
वर्ष 2017 से पहले भारत में अप्रत्यक्ष करों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता था, जो संबंधित वस्तु या सेवा के आधार पर लागू होते थे। लेकिन 2017 में वस्तु एवं सेवा कर यानी GST लागू होने के बाद अप्रत्यक्ष करों की संरचना काफी हद तक सरल हो गई।
GST भारत का मुख्य अप्रत्यक्ष कर है। यह अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर लागू होता है और इसने कई पुराने अप्रत्यक्ष करों की जगह लेकर कर व्यवस्था को अधिक एकीकृत बनाया है।
GST आपूर्ति शृंखला के अलग-अलग चरणों पर वसूला जाता है, लेकिन इनपुट टैक्स क्रेडिट की व्यवस्था कर पर कर लगने की समस्या को काफी हद तक कम करती है। उपभोक्ताओं के लिए यह बिल का हिस्सा बन जाता है। वहीं व्यवसायों के लिए इसमें रजिस्ट्रेशन, इन्वॉइसिंग, और रिटर्न्स जैसे अनुपालन संबंधी कार्य शामिल होते हैं।
शराब और पेट्रोलियम उत्पादों पर विशेष प्रकार के कर लगाए जाते हैं। यही कारण है कि इनकी कीमतें अक्सर अधिक दिखाई देती हैं। ये अप्रत्यक्ष करों के ऐसे उदाहरण हैं जो सरकार के लिए महत्वपूर्ण राजस्व का स्रोत बनते हैं।
अप्रत्यक्ष करों के भी कई फायदे हैं, जो इन्हें कर प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते हैं। आइए इनके प्रमुख लाभ समझते हैं:
GST जैसे अप्रत्यक्ष कर सभी उपभोक्ताओं पर लागू होते हैं। इसलिए आय स्तर चाहे जो भी हो, वस्तुओं और सेवाओं का उपयोग करने वाला हर व्यक्ति अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से कर व्यवस्था में योगदान देता है।
अप्रत्यक्ष कर चुकाने के लिए उपभोक्ता को अलग से कागजी प्रक्रिया नहीं करनी पड़ती। जब वस्तु या सेवा खरीदी जाती है, उसी समय कर वसूल लिया जाता है और विक्रेता इसे सरकार को जमा करा देता है।
शराब, सिगरेट और अन्य हानिकारक उत्पादों पर अप्रत्यक्ष कर आमतौर पर अधिक लगाया जाता है। इससे उनकी कीमत बढ़ती है, जिससे लोगों में जागरूकता आती है और ऐसे उत्पादों का उपभोग कम हो सकता है।
अप्रत्यक्ष कर अक्सर वस्तु या सेवा की कीमत में शामिल होते हैं। इसलिए कई बार उपभोक्ता को यह अलग से महसूस नहीं होता कि वह कितना कर चुका रहा है। वह खरीदारी के समय कुल कीमत का भुगतान करता है और कर उसी में शामिल होता है।
हम यह समझ चुके हैं कि कर मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित होते हैं: प्रत्यक्ष कर, जो व्यक्ति या व्यवसाय सीधे सरकार को देता है; और अप्रत्यक्ष कर, जो वस्तुओं एवं सेवाओं पर लगता है और मध्यस्थों के माध्यम से उपभोक्ता तक पहुंचता है।
दोनों के बीच अंतर को बेहतर समझने के लिए नीचे दी गई टेबल देखें:
| विशेषता | प्रत्यक्ष कर | अप्रत्यक्ष कर |
|---|---|---|
| कर का आधार | व्यक्ति या व्यवसाय की आय या लाभ पर सीधे लगाया जाता है | आय या लाभ के बजाय वस्तुओं और सेवाओं पर लगाया जाता है |
| भुगतान की प्रक्रिया | करदाता सीधे सरकार को कर देता है | कर मध्यस्थ, जैसे विक्रेता या सेवा प्रदाता, के माध्यम से सरकार तक पहुंचता है |
| कौन भुगतान करता है | आय अर्जित करने वाले व्यक्ति और व्यवसाय | वस्तु या सेवा खरीदने वाला अंतिम उपभोक्ता |
| कर दर | आय या लाभ के अनुसार बदल सकती है | अक्सर सभी पर समान दर लागू होती है, चाहे आय कुछ भी हो |
| भार स्थानांतरित करना | इसका भार किसी और पर नहीं डाला जा सकता | इसका भार अंतिम उपभोक्ता पर डाला जा सकता है |
| कर की प्रकृति | प्रगतिशील, यानी आय बढ़ने पर कर का भार बढ़ सकता है | प्रतिगामी प्रभाव वाला, यानी यह सभी आय वर्गों को लगभग समान रूप से प्रभावित कर सकता है |
| उदाहरण | आयकर, कॉर्पोरेट कर, संपत्ति कर | GST, VAT, उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क |
| प्रशासन | केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) | केंद्र और राज्य सरकारें, विशेष रूप से GST कौंसिल के माध्यम से |
| अनुपालन | वार्षिक आयकर रिटर्न दाखिल करना होता है | व्यवसायों को मासिक या तिमाही रिटर्न दाखिल करने पड़ सकते हैं |
प्रत्यक्ष कर नीतिगत दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर इनमें कुछ चुनौतियां भी होती हैं। आइए इनके लाभ और हानियां समझते हैं:
प्रत्यक्ष करों को अक्सर अधिक इक्वीटाब्ले माना जाता है, क्योंकि ये आमतौर पर आय के आधार पर लगाए जाते हैं। अधिक कमाने वाले लोग सामान्यतः अधिक कर देते हैं। इससे कर प्रणाली में संतुलन और समानता मजबूत होती हैं।
करदाता को आमतौर पर पहले से पता होता है कि उसे कितना कर देना है, कब देना है और किस तरीके से देना है। इससे सरकार और करदाता दोनों के लिए स्पष्टता बनी रहती है।
जब करदाता सीधे सरकार को कर देता है, तो वह बेहतर शासन, पारदर्शिता और सार्वजनिक सेवाओं की अपेक्षा भी करता है। इससे राजकोषीय जवाबदेही मजबूत हो सकती है।
आयकर और कॉर्पोरेट कर औपचारिक अर्थव्यवस्था में सरकार के लिए स्थिर राजस्व स्रोत होते हैं। भले ही आर्थिक चक्रों के अनुसार इनमें उतार-चढ़ाव आए, फिर भी ये सरकारी आय के प्रमुख स्तंभ बने रहते हैं।
सरकार प्रत्यक्ष करों के माध्यम से अधिक भुगतान क्षमता रखने वाले वर्ग से राजस्व एकत्र कर सकती है और उसे कल्याणकारी योजनाओं तथा विकास कार्यों में लगा सकती है। इससे आय असमानता कम करने में मदद मिलती है।
प्रत्यक्ष करों की एक बड़ी चुनौती कर चोरी है। कुछ व्यक्ति या व्यवसाय अपनी आय कम दिखा सकते हैं, खर्च बढ़ाकर दिखा सकते हैं या लेनदेन छिपा सकते हैं, जिससे उनकी कर देनदारी कम हो जाए।
प्रत्यक्ष कर व्यवस्था में दस्तावेज़, आकलन, ऑडिट, नोटिस और रिटर्न प्रोसेसिंग जैसे कई चरण शामिल होते हैं। इससे सरकार और करदाता दोनों पर प्रशासनिक बोझ बढ़ सकता है।
कुछ परिस्थितियों में प्रत्यक्ष करों की उच्च दरें व्यक्ति की डिस्पोजेबल इनकम को कम कर सकती हैं या निवेश पर कर-पश्चात प्रतिफल घटा सकती हैं। इससे निवेश या विस्तार के फैसलों पर असर पड़ सकता है।
यदि कर दरों और सीमाओं को समय पर संशोधित न किया जाए, तो महंगाई के दौरान करदाता उच्च कर-श्रेणी में पहुंच सकता है, भले ही उसकी वास्तविक क्रय-शक्ति में ज्यादा सुधार न हुआ हो।
रिकॉर्ड रखने से लेकर रिटर्न दाखिल करने तक, प्रत्यक्ष कर अनुपालन में समय लगता है। व्यवसायों और स्वरोज़गार से जुड़े करदाताओं के लिए यह प्रक्रिया और भी जटिल हो सकती है।
अप्रत्यक्ष कर बड़े स्तर पर अपेक्षाकृत आसान तरीके से वसूले जा सकते हैं, लेकिन इनका प्रभाव निम्न-आय वर्ग पर अधिक पड़ सकता है। आइए इनके लाभ और हानियां समझते हैं:
अप्रत्यक्ष कर उपभोक्ताओं के लिए सुविधाजनक होते हैं, क्योंकि ये खरीद के समय ही चुकाए जाते हैं। खरीदार को हर लेनदेन के लिए अलग से कोई प्रक्रिया पूरी नहीं करनी पड़ती।
चूंकि ये कर वस्तुओं और सेवाओं की बड़ी श्रेणी पर लागू होते हैं, इसलिए इनका कराधान आधार व्यापक होता है। छोटी खरीद भी सरकार के लिए रेवेन्यू उत्पन्न करती है।
जब अप्रत्यक्ष कर प्रणाली इनवॉइस-बेस्ड होती है, जैसे GST में, तब कर चोरी करना अपेक्षाकृत कठिन हो जाता है। यदि व्यवसाय औपचारिक व्यवस्था में काम कर रहे हों, तो ट्रैकिंग और निगरानी बेहतर होती है।
क्योंकि अप्रत्यक्ष कर कमाने पर नहीं, बल्कि खर्च करने पर लगता है, इसलिए यह बचत को बढ़ावा दे सकता है। जितना कम खर्च करेंगे, उतना ही कम अप्रत्यक्ष कर देंगे।
एक अच्छी तरह से डिजाइन की गई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली अनुपालन को अधिक समान बना सकती है, विकृतियों को कम कर सकती है और राज्यों के बीच वस्तुओं की आवाजाही को आसान बना सकती है।
अप्रत्यक्ष करों की सबसे बड़ी कमी यह है कि एक ही उत्पाद पर सभी लोग समान कर दर चुकाते हैं, चाहे उनकी आय कितनी भी हो। इसलिए निम्न-आय वर्ग पर इसका भार अपेक्षाकृत अधिक महसूस हो सकता है।
यदि अप्रत्यक्ष करों की दरें बढ़ती हैं, तो वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। इससे जीवन-यापन की लागत पर असर पड़ता है, खासकर आवश्यक वस्तुओं के मामले में।
कई उपभोक्ता यह स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाते कि वे वास्तव में कितना कर दे रहे हैं, क्योंकि यह अंतिम कीमत में शामिल होता है। इससे कर संबंधी जागरूकता कम हो सकती है।
जहां उपभोक्ताओं के लिए अप्रत्यक्ष कर आसान लग सकते हैं, वहीं व्यवसायों के लिए यह हमेशा सरल नहीं होता। रजिस्ट्रेशन, इन्वॉइसिंग, रिटर्न फाइलिंग और ऑडिट जैसे कार्य अनुपालन लागत बढ़ाते हैं।
GST लागू होने से पहले भारत की अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में कई बार कैस्केडिंग इफ़ेक्ट यानी कर पर कर लगने की स्थिति बनती थी। GST ने इनपुट टैक्स क्रेडिट के माध्यम से इस समस्या को काफी हद तक कम किया, हालांकि कुछ चुनौतियां अभी भी बनी रह सकती हैं।
भारत में प्रत्यक्ष करों का संग्रह केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड यानी CBDT द्वारा किया जाता है, जो वित्त मंत्रालय के रेवेन्यू विभाग के अंतर्गत कार्य करता है। आइए इस प्रक्रिया को विस्तार से समझते हैं:
CBDT भारत में प्रत्यक्ष करों के प्रशासन के लिए शीर्ष निकाय है। यह प्रत्यक्ष कर नीति और योजना से जुड़े महत्वपूर्ण सुझाव देता है तथा आयकर विभाग के माध्यम से प्रत्यक्ष कर कानूनों के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी निभाता है।
आयकर विभाग CBDT के अधीन कार्य करता है और व्यक्तियों तथा व्यवसायों से आयकर एकत्र करने में सीधे तौर पर जुड़ा होता है। यह TDS यानी टैक्स डेडक्टेड एट सोर्स के प्रबंधन के लिए भी जिम्मेदार है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:
GST यानी गुड्स एंड सर्विस टैक्स एक अप्रत्यक्ष कर है। यह वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर लगाया जाता है और बिक्री के समय व्यवसाय इसे उपभोक्ताओं से वसूल कर सरकार को जमा करते हैं। चूंकि यह कर वस्तु या सेवा की कीमत में शामिल होता है और इसका अंतिम भार उपभोक्ता उठाता है, इसलिए इसे अप्रत्यक्ष कर कहा जाता है।
GST ने भारत की अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाया और इसे अधिक एकीकृत तथा पारदर्शी बनाया। आइए GST के प्रमुख लाभों पर नज़र डालते हैं:
GST के अंतर्गत पंजीकृत व्यवसाय उन करों का क्रेडिट ले सकते हैं जो वे अपने इनपुट्स पर पहले ही चुका चुके हैं, जैसे कच्चा माल, रीसेल के लिए खरीदा गया माल, संचालन में उपयोग की गई सेवाएं आदि। व्यवसायों के लिए यह GST का सबसे व्यावहारिक लाभों में से एक है। इससे कर श्रृंखला अधिक साफ-सुथरी बनती है और सही इन्वॉइसिंग को प्रोत्साहन मिलता है।
कम्पोज़िशन स्कीम पात्र छोटे करदाताओं को सरल अनुपालन का विकल्प देती है। वे सामान्य GST ढांचे का पालन करने के बजाय कुछ शर्तों के अधीन टर्नओवर पर एक निश्चित दर से कर दे सकते हैं। इससे पेपरवर्क कम होता है और छोटे व्यवसायों के लिए कंप्लायंस आसान हो जाता है।
GST के तहत एक्सपोर्ट्स को जीरो-रेटेड माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि निर्यातित वस्तुओं और सेवाओं पर घरेलू कर भार उसी रूप में नहीं लगता जैसा घरेलू बिक्री पर लगता है। नियमों के अधीन निर्यातक इनपुट टैक्स का रिफंड भी प्राप्त कर सकते हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय निर्यात अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकता है।
GST ने रजिस्ट्रेशन, रिटर्न फाइलिंग, इनवॉइस फाइलिंग और इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड्स जैसी प्रक्रियाओं के जरिए कर अनुपालन को अधिक डिजिटल बनाया है।
प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर के बीच का अंतर केवल परिभाषा तक सीमित नहीं है। इसका सीधा प्रभाव इस बात पर पड़ता है कि आपकी आय में से कितना धन आपके पास बचता है और आप अपनी कर जिम्मेदारियों की योजना कैसे बनाते हैं।
प्रत्यक्ष कर, जैसे आयकर और पूंजीगत लाभ कर, व्यक्तिगत और प्रगतिशील प्रकृति के होते हैं। इनमें अधिक कमाने वाले व्यक्ति से अधिक योगदान की अपेक्षा की जाती है। वहीं अप्रत्यक्ष कर, जैसे GST, लेनदेन आधारित और व्यापक होते हैं। इन्हें वस्तुओं और सेवाओं की खरीद के दौरान सभी लोग चुकाते हैं, चाहे उनकी आय कितनी भी हो।
भारत की कर व्यवस्था इन दोनों प्रकार के करों के संतुलन पर आधारित है। किसी व्यक्ति या व्यवसाय के लिए यह समझना आवश्यक है कि कौन-सा कर उसकी स्थिति पर कैसे लागू होता है; चाहे बात हालिया निवेश बिक्री पर कैपिटल गेन्स टैक्स की गणना की हो, व्यवसाय के GST दायित्वों की हो, या आयकर में डिडक्शन्स का सही उपयोग करने की।
1
GST एक अप्रत्यक्ष कर है। यह बिक्री के समय व्यवसाय द्वारा उपभोक्ता से वसूला जाता है और बाद में सरकार को जमा किया जाता है। अंतिम लागत उपभोक्ता वहन करता है, इसलिए इसकी प्रकृति अप्रत्यक्ष मानी जाती है।
2
जो कर व्यक्ति या संस्था सीधे सरकार को देती है, जैसे आयकर, वह प्रत्यक्ष कर कहलाता है। जो कर किसी मध्यस्थ, जैसे विक्रेता या सेवा प्रदाता, के माध्यम से वसूला जाता है, जैसे GST, वह अप्रत्यक्ष कर कहलाता है।
3
हाँ, प्रत्यक्ष करों की दरें आमतौर पर आय या लाभ के आधार पर तय होती हैं, जबकि अप्रत्यक्ष करों की दरें वस्तु या सेवा के प्रकार के अनुसार भिन्न हो सकती हैं।
4
कोई भी व्यक्ति या संस्था जिसकी करयोग्य आय या लाभ है, प्रत्यक्ष कर चुकाने के लिए उत्तरदायी हो सकती है। इसमें व्यक्ति, फर्म और कंपनियां शामिल हो सकती हैं, जैसा कि लागू कानूनों में निर्धारित है।
5
राजस्व संग्रह के आधार पर देखा जाए तो वर्तमान समय में GST भारत के सबसे बड़े कर स्रोतों में से एक है। वहीं प्रत्यक्ष करों में आयकर सरकार की प्रत्यक्ष कर प्राप्तियों का बड़ा हिस्सा बनाता है।
6
हाँ, TDS यानी टैक्स डेडक्टेड एट सोर्स एक प्रत्यक्ष कर है। यह किसी व्यक्ति की आय से काटकर सरकार को जमा किया जाता है।
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Ref. No. KLI/22-23/E-BB/999
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